भारत के मशहूर वन के प्रकार व इतिहास | Indian Famous Forest history types in hindi

भारत के मशहूर वन Indian Famous Forest history types in hindi

भारत के मशहूर वन के प्रकार व इतिहास:- वन किसी भी देश के सबसे आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों में शामिल होते है। वनो का पर्यावरण संरक्षण में योगदान होने के अतिरिक्त यह विभिन वन्य-जीवों का घर भी होते है ऐसे में यह प्राकृतिक संतुलन के लिए आवश्यक है। साथ ही मानव द्वारा लकड़ी, औषधि, फल-फूल, घास एवं मवेशियों के लिए चारे का पूर्ति भी वनो के माध्यम से पूरी की जाती है जिससे की वन मानव अस्तित्व के लिए भी आवश्यक है। भारत दुनिया के उन सौभाग्यशाली देशो के शामिल है जहाँ दुनिया में सबसे अधिक वन क्षेत्र पाया जाता है। इसके अतिरिक्त हमारा देश वन जैव-विविधता के मामले में भी अग्रणी देशो में शुमार है।

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भारत के मशहूर वन Indian Famous Forest history types in hindi
Indian Famous Forest history types in hindi

आज के इस आर्टिकल के माध्यम से आपको भारत के मशहूर वन के प्रकार व इतिहास (Indian Famous Forest history types in hindi) सम्बंधित जानकारी प्रदान की जाएगी जिससे की आप देश के वनों के प्रकार से भलीभाँति अवगत हो सकेंगे। साथ ही आपको यहाँ देश के वनो सम्बंधित अन्य महत्वपूर्ण भौगोलिक जानकारी भी प्रदान की जाएगी।

भारत में वनों का इतिहास एवं वन प्रबंधन

भारत एशिया महाद्वीप में स्थित देश है। इसकी विशिष्ट स्थिति के कारण इसे प्रायः उपमहाद्वीप की संज्ञा भी दी जाती है। किसी भी स्थान की जलवायु के आधार भी ही इस स्थान पर पेड़-पौधों एवं वनों का विकास होता है। चूँकि भारत में विभिन प्रकार की जलवायु पायी जाती है यही कारण है की यहाँ विभिन प्रकार के वनो का विकास हुआ है। भारत ही दुनिया में सम्भवता ऐसा देश है जहाँ आपको शीतोष्ण हिमालयी क्षेत्रों की वनस्पति से लेकर गर्म रेगिस्तानी मरुस्थल एवं वर्षावन वाले पश्चिमी वनों का दीदार करने को मिलता है। भारत में प्राचीन काल से ही वनों को विभिन रूपो में पूजा जाता है यही कारण रहा है प्रकृति से सामंजस्य रखते हुए हमारी संस्कृति में सदैव से ही वनों के संवर्धन पर बल दिया गया है।

Indian Famous Forest and their types in hindi

आधुनिक समय की बात करें तो भारत में प्रथम वन प्रबंधन वर्ष 1894 में ब्रिटिश काल में किया गया था। हालांकि ब्रिटिश वन प्रबंधन अधिकतर वनों के दोहन पर ही आधारित था यही कारण रहा की औपनिवेशिक काल में देश में वनो का जमकर आर्थिक दोहन किया गया था। स्वतंत्र भारत में प्रथम बार वर्ष 1952 में भारतीय वन अधिनियम के माध्यम से वनो के प्रबंधन का प्रयास गया किया गया था। इस अधिनियम को वर्ष 1988 में संसोधित किया गया। भारतीय वन अधिनियम के अंतर्गत देश के कुल 33 फीसदी भागों पर वन- कवर होना आवश्यक है। भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा वर्ष 2021 में जारी रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल 21.71 फीसदी भाग पर वन क्षेत्र, 2.91 फीसदी भाग पर ट्री कवर एवं कुल 24.62 फीसदी भाग पर वन एवं ट्री कवर मौजूद है।

भारत के मशहूर वन के प्रकार

हमारे देश में विभिन क्षेत्रों में विभिन प्रकार की जलवायु पायी जाती है यही कारण है की पूरे देश में वनो के विभिन प्रकार देखने को मिलते है। यहाँ आपको भारत के वनों के प्रकार एवं उनकी विशेषताओं सम्बंधित जानकारी प्रदान की गयी है।

उष्ण-कटिबंधीय सदाबहार एवं अर्द्ध सदाबहार वन

  • अवस्थिति (Cover)- पश्चिमी घाट एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में
  • औसत वार्षिक वर्षा (Total Average Rain)- 200 cm से अधिक
  • वर्णन (Description)- उष्ण-कटिबंधीय सदाबहार एवं अर्द्ध सदाबहार वन भारत में मुख्य रूप से पश्चिमी घाट एवं उत्तर-पूर्वी भागो में पाए जाते है। जैसा की इन वनो के नाम से ही इंगित है की ये वन उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र में पाए जाने वाले सदाबहार एवं अर्द्ध सदाबहार वन है। इन वनो का सदाबहार होने का कारण इन्हे पर्याप्त मात्रा में नमी मिलना है। इसके अतिरिक्त इन वनो के पेड़ो के फल, फूल एवं पती के खिलने का समय भी भिन्न-भिन्न होता है यही कारण है की ये वन वर्ष भर हरे भरे रहते है। रोजवुड, महोगनी, एबनी एवं एनी इन वनो के मुख्य वृक्ष है। साइडर, कैल एवं होलक अर्द्ध सदाबहार वनो के मुख्य वृक्ष है।

उष्ण-कटिबंधीय पर्णपाती वन

  • अवस्थिति (Cover)- राजस्थान एवं दक्कन पठार के क्षेत्र को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में
  • औसत वार्षिक वर्षा (Total Average Rain)- 70 से 200 cm
  • वर्णन (Description)- उष्ण-कटिबंधीय पर्णपाती वन भारत में हिमायली क्षेत्रों, राजस्थान एवं दक्कन पठार तथा पश्चिमी घाट एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में पाए जाते है। उष्ण-कटिबंधीय पर्णपाती वन को मानसूनी वन भी कहा जाता है जिसका कारण इनका मानसूनी वर्ष के सीजन में पर्याप्त नमी पाकर हरा भरा होना है। शीत-ऋतु शुरू होते ही ये पेड़ नमी बचाने के लिए अपनी पत्तियां गिरा देते है यही कारण है की इन्हे उष्ण-कटिबंधीय पर्णपाती वन भी कहा जाता है। उष्ण-कटिबंधीय पर्णपाती वनो को वर्षा के आधार पर 2 भागो में बाँटा गया है जिनका वर्णन निम्न प्रकार से है :-
    • आर्द्र पर्णपाती वन – उष्ण-कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन देश के उन क्षेत्रों में उगते है जहाँ वार्षिक वर्षा 100 से 200 cm तक होती है। ये प्रायः हिमालय में शिवालिक श्रेणी अर्थात हिमालय के गिरिपाद, ओड़िशा, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों में उगते है। साल, सागवान, शीशम, आँवला, कुसुम, महुआ और चंदन जैसे वृक्ष इन वनो के मुख्य वृक्ष है।
    • शुष्क पर्णपाती वन – उष्ण-कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन भारत में उन क्षेत्रों में उगते है जहाँ वार्षिक वर्षा 70 से 100 cm तक होती है। ये भाग कम वर्षा प्राप्त करते है अतः यहाँ कम नमी वाली वनस्पति जैसे- बेर, खैर, तेन्दु, पलाश एवं अमलतास के वृक्ष उगते है।

उष्ण-कटिबंधीय काँटेदार वन

  • अवस्थिति (Cover)- भारत के पश्चिमी एवं दक्कन के पठारी भागो में
  • औसत वार्षिक वर्षा (Total Average Rain)- 50 cm से कम
  • वर्णन (Description)- उष्ण-कटिबंधीय काँटेदार वन भारत में मुख्यत उन क्षेत्रों में उगते है जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 50 cm से कम होती है। यहाँ मुख्यत कम नमी चाहते वाली कांटेदार झाड़ियाँ ही उगती है साथ ही यहाँ के वृक्ष वर्ष भर पर्णरहित (पतीरहित) होते है। भारत में उष्ण-कटिबंधीय काँटेदार वन मुख्यत राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में ही उगते है इसके अतिरिक्त इसका विस्तार पश्चिमी राज्यों में कम वर्ष वाले क्षेत्रों जैसे गुजरात, पंजाब का पश्चिमी भाग एवं हरियाणा, मध्यप्रदेश में भी है। इन वनो में मुख्यत बबूल, खजूर, नीम, खेजड़ी, बेर एवं खैर के वृक्ष उगते है।

पर्वतीय वन

  • अवस्थिति (Cover)- हिमालय, उत्तर-पूर्वी भारत एवं दक्षिण के पश्चिमी एवं पूर्वी घाटों में
  • औसत वार्षिक वर्षा (Total Average Rain)- अवस्थिति एवं ऊँचाई अनुसार
  • वर्णन (Description)- भारत में पर्वतीय वन मुख्यत हिमालयी क्षेत्रों एवं पश्चिम एवं पूर्वी घाट के पर्वतीय क्षेत्र में पाए जाते है। यहाँ वर्षा का वितरण अवस्थिति एवं ऊँचाई अनुसार भिन्न-भिन्न है। हिमालयी क्षेत्रों में ऊंचाई के अनुसार वर्षा की मात्रा घटती जाती है। वही पश्चिमी-घाट एवं पूर्वी घाट में वर्ष भर खूब वर्षा होती है। हिमालयी वनो को ऊंचाई के अनुसार पर्णपाती, शीतोष्ण कटिबंध, अल्पाइन एवं टुंड्रा वनस्पति में विभाजित किया जाता है वही दक्षिणी क्षेत्र में पाये जाने वाले शीतोष्ण पर्वतीय वनो की शोलास कहा जाता है।

वेलांचली, अनूप या मैंग्रोव वन

  • अवस्थिति (Cover)- भारत के आर्द्र, जल-संरक्षित झीलों एवं तटीय क्षेत्रों में डेल्टा मुहाने पर
  • औसत वार्षिक वर्षा (Total Average Rain)- अवस्थिति एवं ऊँचाई अनुसार
  • वर्णन (Description)- हमारे देश में वेलांचली, अनूप या मैंग्रोव वन देश में विभिन भागों में फैले है। इन वनो को देश में जल-क्षेत्रो एवं नमी के आधार पर निर्धारित किया गया है। इनमे अधिकतर क्षेत्र रामसर साइट्स में शामिल किये गये है। भारत में गुजरात एवं राजस्थान के खारे जल की झीलें, तटीय क्षेत्र की लैगून, उत्तरी-भारत की ताजे जल की झीले, केवलादेव राष्ट्रीय पार्क, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख की हिमानी झीले एवं अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में स्थित मैंग्रोव वन शामिल है। पश्चिम बंगाल मे स्थित सुन्दरवन मैंग्रोव वन का उत्तम उदाहरण है।

इस प्रकार से हमारे देश में मुख्यत 5 प्रकार के वन पाए जाते है जिनको जलवायु एवं वर्षा के पैटर्न के आधार पर विभिन भागो में विभाजित किया गया है।

भारत के मशहूर वन के प्रकार व इतिहास सम्बंधित प्रश्न (FAQ)

भारत में कुल कितने प्रतिशत भाग पर वन पाए जाते है ?

भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा वर्ष 2021 में जारी रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल 21.71 भाग पर वन क्षेत्र, 2.91 फीसदी भाग पर ट्री कवर एवं कुल 24.62 फीसदी भाग पर वन एवं ट्री कवर मौजूद है।

भारत में वन-प्रबंधन के लिए किये गए विभिन प्रयासों सम्बंधित जानकारी दे ?

भारत में वन-प्रबंधन हमेशा से ही समाज का अभिन्न अंग रहा है। वर्तमान समय में भारत में प्रथम वन प्रबंधन वर्ष 1894 में ब्रिटिश काल में किया गया था। इस प्रबंधन का उद्देश्य देश के वनो का आर्थिक दोहन करके अपने हितो को साधना था जिस कारण इस दौरान वन प्रबंधन में विशेष तरक्की दर्ज नहीं की गयी। स्वतंत्र भारत में प्रथम बार वर्ष 1952 में भारतीय वन अधिनियम के माध्यम से वनो के प्रबंधन का प्रयास गया किया गया था। इस अधिनियम को वर्ष 1988 में संसोधित किया गया।

भारतीय वन अधिनियम के अंतर्गत कितने फीसदी भागो पर वन क्षेत्र होना आवश्यक है ?

भारतीय वन अधिनियम के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल के 33 फीसदी भागो पर वन क्षेत्र होना आवश्यक है। पर्वतीय क्षेत्र में कम से कम 60 फीसदी भूमि पर वन क्षेत्र होना आवश्यक है।

भारत में कुल कितने प्रकार के वन पाए जाते है ?

भारत में पाए जाने वाले विभिन प्रकार के वनो की जानकारी के लिए ऊपर दिया गया आर्टिकल पढ़े। इसके माध्यम से आपको देश में पाए जाने वाले विभिन वनो एवं प्रकार की जानकारी दी गयी है।

भारत में स्वतंत्रता के पश्चात प्रथम वन अधिनियम कब लागू किया गया ?

भारत में स्वतंत्रता के पश्चात प्रथम वन अधिनियम वर्ष 1952 में लागू किया गया जिसे की वर्ष 1988 में संसोधित किया गया है।

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