बीरबल की जीवनी – Biography of Birbal in Hindi

बीरबल की जीवनी – Biography of Birbal in Hindi :- बीरबल मुग़ल शासक अकबर के दरबार के वो सबसे प्रसिद्ध सलाहकार थे. बीरबल भारतीय इतिहास में उनकी चतुराई के लिये जाने जाते है, और उनपर लिखित काफी कहानिया भी हमे देखने को मिलती, जिसमे बताया गया है की कैसे बीरबल चतुराई से अकबर की मुश्किलो को हल करते थे. 1556-1562 में अकबर ने बीरबल को अपने दरबार में कवी के रूप में नियुक्त किया था. 

बीरबल का मुग़ल साम्राज्य के साथ घनिष्ट संबंध था, इसीलिये उन्हें महान मुग़ल शासक अकबर के नवरत्नों में से एक कहा जाता था. 1586 में, उत्तरी-दक्षिणी भारत में लड़ते हुए वे शहीद हुए थे. बीरबल की कहानियो का कोई सबूत हमें इतिहास में दिखाई नही देता. अकबर के साम्राज्य के अंत में, स्थानिक लोगो ने अकबर-बीरबल की प्रेरित और प्रासंगिक कहानिया बनानी भी शुरू की. अकबर-बीरबल की ये कहानिया पुरे भारत में धीरे-धीरे प्रसिद्ध होने लगी थी. 

बीरबल का  परिचय

जन्म

पण्डित महेश दास भट्ट, 1528 सीधी मध्यप्रदेश, भारत

निधन

16 फरवरी 1586 (उम्र 57-58), स्वात घाटी, आज पाकिस्तान

जीवनसंगी

उर्वशी देवी

संतान

सौदामणि दूबे (पुत्री)

धर्म

हिन्दू धर्म, दीन इलाही

पेशा

अकबर के साम्राज्य में दरबारी और सलाहकार

बीरबल का बचपन

बीरबल का जन्म महेश दास के नाम से 1528 में, कल्पी के नजदीक किसी गाव में हुआ था. इनके बचपन का नाम महेश दास था। बचपन से ही वो बहुत ही चतुर एवं बुद्धिमान थे। आज उनका जन्मस्थान भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में आता है. इतिहासकारो के अनुसार उनका जन्मगाव यमुना नदी के तट पर बसा टिकवनपुर था.  

उनके जन्म के विषय मे मतभिन्नता है। कुछ विद्वान उन्हें आगरा के निवासी, कोई कानपुर के घाटमपुर तहसील के, कोई दिल्ली के निवासी और कोई मध्य प्रदेश के सीधी जिले का निवासी बताते हैं। पर ज्यादातर विद्वान मध्य प्रदेश के सीधी जिले के घोघरा गाँव को ही बीरबल का जन्मस्थान स्वीकार करते हैं।

उनके पिता का नाम गंगा दास और माता का नाम अनभा दवितो था. वे हिन्दू ब्राह्मण परीवार जिन्होंने पहले भी कविताये या साहित्य लिखे है, उनके तीसरे बेटे थे. बीरबल / Birbal हिंदी, संस्कृत और पर्शियन भाषा में शिक्षा प्राप्त की थी. बीरबल कविताये भी लिखते थे, ज्यादातर उनकी कविताये ब्रज भाषा में होती थी, इस वजह से उन्हें काफी प्रसिद्धि भी मिली थी. 

बीरबल का अकबर से मिलन

अकबर से मिलन संबंधी अनेक कथाएं प्रचलित है। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार बादशाह अकबर ने अपने एक पान का बीड़ा लगाने वाले नौकर को एक "पाओभर" (आज का लगभग 250 ग्राम) चूना लेकर आने को कहा। नौकर किले के बाहर दुकान करने वाले पनवाड़ी से पाओभर चूना लेने गया। इतना सारा चूना ले जाते देख पनवाड़ी को कुछ शक होता है। इसलिए बीरबल नौकर से पूरा घटनाक्रम जानता है, और कहता है कि बादशाह यह चूना तुझको ही खिलवायेगा। तेरे पान में लगे ज्यादा चूने से बादशाह की जीभ कट गई है, इसलिए यह सब चूना तुझे ही खाना पड़ेगा। इसलिए इतना ही घी भी ले जा, जब बादशाह चूना खाने को कहे तो चूना खाने के बाद घी पी लेना।

नौकर दरबार मे चूना लेकर जाता है, और बादशाह नौकर को वह सारा पाओभर (250 ग्राम) चूना खाने का आदेश देता है। नौकर वह सारा चूना खा लेता है, लेकिन उस पनवाड़ी बीरबल की सलाह के अनुसार घी भी पी लेता है। अगले दिन जब बादशाह का वह नौकर पुनः जब राज दरबार पहुचता है, तो अकबर उसे जीवित देख आश्चर्य से उसके जीवित बचने का कारण जानता है। नौकर सारी बात बादशाह को बताता है, कि कैसे किले के बाहर के पनवाड़ी की समझ-बूझ से वह बच सका। बादशाह उस पनवाड़ी की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो उसे दरबार मे बुलवाते है। इस प्रकार बादशाह अकबर और बीरबल का पहली बार आमना सामना होता है। और अकबर ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति को अपने दरबार मे स्थान देते हैं।

अकबर और बीरबल

बीरबल महेशदास नामक बादफ़रोश ब्राह्मण थे जिसे हिन्दी में भाट कहते हैं। यह जाति धनाढ्यों की प्रशंसा करने वाली थी। यद्यपि बीरबल कम पूँजी के कारण बुरी अवस्था में दिन व्यतीत कर रहे थे, पर बीरबल में बुद्धि और समझ भरी हुई थी। अपनी बुद्धिमानी और समझदारी के कारण यह अपने समय के बराबर लोगों में मान्य हो गए। जब सौभाग्य से अकबर बादशाह की सेवा में पहुँचे, तब अपनी वाक्-चातुरी और हँसोड़पन से बादशाही मजलिस के मुसाहिबों और मुख्य लोगों के गोल में जा पहुँचे और धीरे-धीरे उन सब लोगों से आगे बढ़ गए। बहुधा बादशाही पन्नों में इन्हें मुसाहिबे-दानिशवर राजा बीरबल लिखा गया है। 

जब राजा लाहौर पहुँचे तो हुसैन कुली ख़ाँ ने जागीरदारों के साथ ससैन्य नगरकोट पहुँचकर उसे घेर लिया। जिस समय दुर्ग वाले कठिनाई में पड़े हुए थे, दैवात् उसी समय इब्राहीम हुसेन मिर्ज़ा का बलवा आरम्भ हो गया था और इस कारण कि उस विद्रोह का शान्त करना उस समय का आवश्यक कार्य था, इससे दुर्ग विजय करना छोड़ देना पड़ा। अंत में राजा की सम्मति से विधिचन्द्र से पाँच मन सोना और ख़ुतबा पढ़वाने, बादशाही सिक्का ढालने तथा दुर्ग काँगड़ा के फाटक के पास मसजिद बनवाने का वचन लेकर घेरा उठा लिया गया। 30वें वर्ष सन् 994 हि. (सन् 1586 ई.) में जैन ख़ाँ कोका यूसुफ़जई जाति को, जो स्वाद और बाजौर नामक पहाड़ी देश की रहनेवाली थी, दंड देने के लिए नियुक्त हुआ था। उसने बाजौर पर चढ़ाई करके स्वात पहुँच कर उस जाति को दंड दिया।
 
घाटियाँ पार करते-करते सेना थक गई थी, इसलिये जैन ख़ाँ कोका ने बादशाह के पास नई सेना के लिए सहायतार्थ प्रार्थना की। शेख अबुल फ़ज़ल ने उत्साह और स्वामिभक्ति से इस कार्य के लिये बादशाह ने अपने को नियुक्त किये जाने की प्रार्थना की।

ऐतिहासिक भूमिका बनाम लोककथाओं

लोक कथाओं में, उन्हें अकबर की तुलना में कम उम्र के एक धार्मिक हिंदू के रूप में हमेशा चित्रित किया जाता है, और मुस्लिम दरबारियों के विरोध में नैतिक रूप से कड़े होते हैं, जो उनके खिलाफ षड्यंत्र करते हैं; उनकी सफलता केवल उनके कौशल के कारण थी और उन्होंने सम्राट को इस्लाम से हिंदू धर्म की परवरिश करने का आश्वासन दिया। इस प्रकार उन्हें अकबर पर धार्मिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत प्रभाव प्राप्त करने के रूप में दर्शाया गया है, जो कि उनकी बुद्धि और तेज जीभ का प्रयोग करते हैं और कभी हिंसा नहीं करते हैं। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से उन्होंने कभी ऐसी भूमिका नहीं निभाई। 

अपने बुद्धि या कविता के बजाय सम्राट के विश्वासपात्र के रूप में अपनी आध्यात्मिक उत्कृष्टता और स्थिति पर बल देते हुए, अबल फजल ने उन्हें सम्मानित किया। 

आधुनिक हिंदू विद्वानों ने दावा किया कि उन्होंने अकबर को बोल्ड फैसले बनाया और अदालत में रूढ़िवादी मुस्लिम उन्हें तुच्छ जाना, क्योंकि उसने अकबर को इस्लाम का त्याग दिया लेकिन कोई सबूत मौजूद नहीं है कि उन्होंने अकबर के विश्वासों को प्रभावित किया। हालांकि सूत्रों का कहना है कि उन्होंने अकबर की नीतियों को कुछ हद तक प्रभावित किया था। यह उनके लिए अकबर का स्नेह था, उनकी धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक उदारवाद जो इसके लिए कारण था और बीरबल का कारण नहीं था। ऐतिहासिक रूप से, वह अकबर की धार्मिक नीति के समर्थक और उनके धर्म, दीन-ए-इलैही थे।

मौत

अफगानिस्तान के यूसुफ़जई कबीले ने मुग़ल सल्तनत के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया | उसके दमन के लिए जो जैन ख़ाँ कोका के नेतृत्व में पहला सैन्य दल भेजा गया | लड़ते लड़ते वह सैन्य दल थक गया तो बीरबल के नेतृत्व में दूसरा दल वहां भेजा गया | बुद्धि कौशल के महारथी को सैन्य अभियानों का कोई अधिक अनुभव नहीं था | सिवाय इसके कि वे सदैव सैन्य अभियानों में भी अकबर के साथ रहते थे | पूर्व के सेनापति कोका को एक हिन्दू के साथ साथ अभियान करना कतई गवारा नहीं हुआ | पारस्परिक मनोमालिन्य के चलते स्वात वैली में 8000 सैनिकों के साथ अकबर के सखा बीरबल खेत रहे | इतना ही नहीं तो अंतिम संस्कार के लिए उनका शव भी नहीं मिला |

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