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श्रीनिवास रामानुजन जीवन परिचय (जीवनी) | Srinivasa Ramanujan Biography in Hindi

श्रीनिवास रामानुजन जीवन परिचय (जीवनी) | Srinivasa Ramanujan Biography in Hindi | श्रीनिवास रामानुजन् एक महान भारतीय गणितज्ञ | रामानुजन संख्याएँ | गणित के विद्वान श्रीनिवास रामानुजन का जीवन परिचय |Srinivasa Ramanujan Biography, Education, Work and Movie Details in Hindi

यहां आप श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी के बारे में अध्ययन करेंगे। आप श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी के बारे में बहुत सारे तथ्य हिंदी भाषा में जानेंगे।

श्रीनिवास रामानुजन जीवनी Srinivasa Ramanujan Biography in Hindi

श्रीनिवास रामानुजन् एक महान भारतीय गणितज्ञ थे इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। रामानुजन् ने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है। रामानुजन ने दस वर्षों की आयु में प्राइमरी परीक्षा में पूरे जिले में सबसे अधिक अंक प्राप्त किया हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्हें गणित और अंग्रेजी मे अच्छे अंक लाने के कारण सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और आगे कालेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला। वर्ष 1908 में इनके माता पिता ने इनका विवाह जानकी नामक कन्या से कर दिया।
श्रीनिवास रामानुजन जीवन परिचय (जीवनी)
श्रीनिवास रामानुजन् 
जीवन परिचय बिंदु
श्रीनिवास रामानुजन्
पूरा नाम
श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर
जन्म
22 दिसम्बर, 1887
जन्म स्थान
इरोड, तमिल नाडु
पिता
श्रीनिवास अय्यंगर
विवाह
जानकी नामक कन्या
माता
कोमलताम्मल
डॉक्टरी सलाहकार
गॉडफ्रे हेरॉल्ड हार्डी और जॉन इडेन्सर लिटलवुड
क्षेत्र
गणित
शिक्षा
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
राष्ट्रीयता
भारतीय
प्रसिद्धि
लैंडॉ-रामानुजन् स्थिरांक, रामानुजन्-सोल्डनर स्थिरांक, रामानुजन् थीटा फलन, रॉजर्स-रामानुजन् तत्समक, रामानुजन् अभाज्य, कृत्रिम थीटा फलनs,रामानुजन् योग
मृत्यु
26 अप्रैल, 1920 चेटपट, (चेन्नई), तमिल नाडु

श्रीनिवास रामानुजन प्रारंभिक जीवन

श्रीनिवास अयंगर रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को तमिल नाडु के कोयंबटूर के ईरोड नामक गांव में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर और माता का नाम कोमलताम्मल था। जब बालक रामानुजन एक वर्ष के थे तभी उनका परिवार कुंभकोणम में आकर बस गया था। इनके पिता एक स्थानिय व्यापारी के पास मुनीम का कार्य करते थे। शुरू में बालक रामानुजन का बौद्धिक विकास दूसरे सामान्य बालकों जैसा नहीं था और वह तीन वर्ष की आयु तक बोलना भी नहीं सीख पाए थे, जिससे उनके माता-पिता को चिंता होने लगी। जब बालक रामानुजन पाँच वर्ष के थे तब उनका दाखिला कुंभकोणम के प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया।
रामानुजन पैतृक घर
रामानुजन पैतृक घर Pic Credit wikipedia

श्रीनिवास रामानुजन शिक्षा (Ramanujan Education)

पारंपरिक शिक्षा में रामानुजन का मन कभी भी नहीं लगा और वो ज्यादातर समय गणित की पढाई में ही बिताते थे। आगे चलकर उन्होंने दस वर्ष की आयु में प्राइमरी परीक्षा में पूरे जिले में सर्वोच्च अंक प्राप्त किया और आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल गए।

रामानुजन बड़े ही सौम्य और मधुर व्यवहार के व्यक्ति थे। वह इतने सौम्य थे कि कोई इनसे नाराज हो ही नहीं सकता था। धीरे-धीरे इनकी प्रतिभा ने विद्यार्थियों और शिक्षकों पर अपना छाप छोड़ना शुरू कर दिया। वह गणित में इतने मेधावी थे कि स्कूल के समय में ही कॉलेज स्तर का गणित पढ़ लिया था। हाईस्कूल की परीक्षा में इन्हें गणित और अंग्रेजी मे अच्छे अंक लाने के कारण छात्रवृत्ति मिली जिससे कॉलेज की शिक्षा का रास्ता आसान हो गया।

उनके अत्यधिक गणित प्रेम ने ही उनकी शिक्षा में बाधा डाला। दरअसल, उनका गणित-प्रेम इतना बढ़ गया था कि उन्होंने दूसरे विषयों को पढना छोड़ दिया। दूसरे विषयों की कक्षाओं में भी वह गणित पढ़ते थे और प्रश्नों को हल किया करते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि कक्षा 11वीं की परीक्षा में वे गणित को छोड़ बाकी सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए जिसके कारण उनको मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद हो गई। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही ठीक नहीं थी और छात्रवृत्ति बंद होने के कारण कठिनाईयां और बढ़ गयीं। यह दौर उनके लिए मुश्किलों भरा था।

संघर्ष का समय

घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए रामानुजन ने गणित के ट्यूशन और कुछ एकाउंट्स का काम किया। वर्ष 1907 में उन्होंने बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी लेकिन इस बार भी वह अनुत्तीर्ण हो गए। इस असफलता के साथ उनकी पारंपरिक शिक्षा भी समाप्त हो गई।

नोकरी पाने की इच्छा में रामानुजन मद्रास आए और नौकरी की तलाश शुरू कर दी और वे इसी समय रामानुजन वहां के डिप्टी कलेक्टर श्री वी. रामास्वामी अय्यर से मिले। अय्यर गणित के बहुत बड़े विद्वान थे। यहां पर श्री अय्यर ने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और जिलाधिकारी श्री रामचंद्र राव से कह कर इनके लिए 25 रूपये मासिक छात्रवृत्ति का प्रबंध भी कर दिया। इस वृत्ति पर रामानुजन ने मद्रास में एक साल रहते हुए अपना प्रथम शोधपत्र प्रकाशित किया। शोध पत्र का शीर्षक था “बरनौली संख्याओं के कुछ गुण” और यह शोध पत्र जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ था।
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प्रोफेसर हार्डी के साथ पत्रव्यावहार

इस समय भारतीय और पश्चिमी रहन सहन में एक बड़ी दूरी थी और इस वजह से सामान्यतः भारतीयों को अंग्रेज वैज्ञानिकों के सामने अपने बातों को प्रस्तुत करने में काफी संकोच होता था। इधर स्थिति कुछ ऐसी थी कि बिना किसी अंग्रेज गणितज्ञ की सहायता लिए शोध कार्य को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। इस समय रामानुजन के पुराने शुभचिंतक इनके काम आए और इन लोगों ने रामानुजन द्वारा किए गए कार्यों को लंदन के प्रसिद्ध गणितज्ञों के पास भेजा। पर यहां इन्हें कुछ विशेष सहायता नहीं मिली लेकिन एक लाभ यह हुआ कि लोग रामानुजन को थोड़ा बहुत जानने लगे थे।
Pic Credit : bharatdiscovery प्रोफेसर हार्डी
इसी समय रामानुजन ने अपने संख्या सिद्धांत के कुछ सूत्र प्रोफेसर शेषू अय्यर को दिखाए तो उनका ध्यान लंदन के ही प्रोफेसर हार्डी की तरफ गया। प्रोफेसर हार्डी उस समय के विश्व के प्रसिद्ध गणितज्ञों में से एक थे। और अपने सख्त स्वभाव और अनुशासन प्रियता के कारण जाने जाते थे। प्रोफेसर हार्डी के शोधकार्य को पढ़ने के बाद रामानुजन ने बताया कि उन्होने प्रोफेसर हार्डी के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर खोज निकाला है। अब रामानुजन का प्रोफेसर हार्डी से पत्रव्यवहार आरंभ हुआ।

अब यहां से रामानुजन के जीवन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ जिसमें प्रोफेसर हार्डी की बहुत बड़ी भूमिका थी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जिस तरह से एक जौहरी हीरे की पहचान करता है और उसे तराश कर चमका देता है, रामानुजन के जीवन में वैसा ही कुछ स्थान प्रोफेसर हार्डी का है। प्रोफेसर हार्डी आजीवन रामानुजन की प्रतिभा और जीवन दर्शन के प्रशंसक रहे। रामानुजन और प्रोफेसर हार्डी की यह मित्रता दोनो ही के लिए लाभप्रद सिद्ध हुई। एक तरह से देखा जाए तो दोनो ने एक दूसरे के लिए पूरक का काम किया। प्रोफेसर हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे।
आरंभ में रामानुजन ने जब अपने किए गए शोधकार्य को प्रोफेसर हार्डी के पास भेजा तो पहले उन्हें भी पूरा समझ में नहीं आया। जब उन्होंने अपने मित्र गणितज्ञों से सलाह ली तो वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में एक दुर्लभ व्यक्तित्व है और इनके द्वारा किए गए कार्य को ठीक से समझने और उसमें आगे शोध के लिए उन्हें इंग्लैंड आना चाहिए। अतः उन्होने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए आमंत्रित किया।

विदेश गमन

कुछ व्यक्तिगत कारणों और धन की कमी के कारण रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी के कैंब्रिज के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। प्रोफेसर हार्डी को इससे निराशा हुई लेकिन उन्होनें किसी भी तरह से रामानुजन को वहां बुलाने का निश्चय किया। इसी समय रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय में शोध वृत्ति मिल गई थी जिससे उनका जीवन कुछ सरल हो गया और उनको शोधकार्य के लिए पूरा समय भी मिलने लगा था। इसी बीच एक लंबे पत्रव्यवहार के बाद धीरे-धीरे प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए सहमत कर लिया। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। रामानुजन ने इंग्लैण्ड जाने के पहले गणित के करीब 3000 से भी अधिक नये सूत्रों को अपनी नोटबुक में लिखा था।
रामानुजन नोटबुक
रामानुजन नोटबुक Pic Credit : bharatdiscovery 
रामानुजन ने लंदन की धरती पर कदम रखा। वहां प्रोफेसर हार्डी ने उनके लिए पहले से व्ववस्था की हुई थी अतः इन्हें कोई विशेष परेशानी नहीं हुई। इंग्लैण्ड में रामानुजन को बस थोड़ी परेशानी थी और इसका कारण था उनका शर्मीला, शांत स्वभाव और शुद्ध सात्विक जीवनचर्या। अपने पूरे इंग्लैण्ड प्रवास में वे अधिकांशतः अपना भोजन स्वयं बनाते थे। इंग्लैण्ड की इस यात्रा से उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। उन्होंने प्रोफेसर हार्डी के साथ मिल कर उच्चकोटि के शोधपत्र प्रकाशित किए। अपने एक विशेष शोध के कारण इन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. की उपाधि भी मिली। लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन की शैली उनके अधिक अनुकूल नहीं थी और उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। डॉक्टरों ने इसे क्षय रोग बताया। उस समय क्षय रोग की कोई दवा नहीं होती थी और रोगी को सेनेटोरियम मे रहना पड़ता था। रामानुजन को भी कुछ दिनों तक वहां रहना पड़ा। वहां इस समय भी यह गणित के सूत्रों में नई नई कल्पनाएं किया करते थे।

रामानुजन का गणित में योगदान (Ramanujan Work)

रामानुजन ने इंग्लैण्ड में पाँच वर्षों तक मुख्यतः संख्या सिद्धान्त के क्षेत्र में काम किया।

सूत्र


पाई के लिये उन्होने एक दूसरा सूत्र भी (सन् १९१० में) दिया था

रामानुजन संख्याएँ



अतः 1729, 4104, 20683, 39312, 40033 आदि रामानुजन संख्याएं हैं।

रामानुजन् अटकल (Ramanujan conjecture)

श्रीनिवास रामानुजन ने सन् १९१६ में एक गणितीय अटकल दिया जिसे रामानुजन् अटकल (Ramanujan conjecture) कहते हैं। इस अटकल के अनुसार १२ भार वाले  कस्प फॉर्म के फुरिए गुणांकों से बना रामानुजन टाऊ फलन (Ramanujan's tau function) ]]
(जहाँ q=eiz)
 को संतुष्ट करता है।
यहाँ  एक अभाज्य संख्या (prime number) है।

रॉयल सोसाइटी की सदस्यता

रामानुजन को रॉयल सोसाइटी का फेलो नामित किया गया। रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है। पूरे भारत में उनके शुभचिंतकों ने उत्सव मनाया और सभाएं की। रॉयल सोसाइटी की सदस्यता के बाद यह ट्रिनीटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने।

स्वदेश आगमन

भारत लौटने पर भी स्वास्थ्य ने इनका साथ नहीं दिया और हालत गंभीर होती जा रही थी। इस बीमारी की दशा में भी इन्होने मॉक थीटा फंक्शन पर एक उच्च स्तरीय शोधपत्र लिखा। रामानुजन द्वारा प्रतिपादित इस फलन का उपयोग गणित ही नहीं बल्कि चिकित्साविज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया जाता है।
मृत्यु

इंग्लैण्ड में रामानुजन को वहां की जलवायु और रहन-सहन की शैली उनके अधिक अनुकूल नहीं थी और उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। डॉक्टरों ने इसे क्षय रोग बताया। भारत लौटने पर भी स्वास्थ्य ने इनका साथ नहीं दिया और हालत गंभीर होती जा रही थी। यहां तक की अब डॉक्टरों ने भीजवाब दे दिया था। अंत में रामानुजन के विदा की घड़ी आ ही गई। 26 अप्रैल 1920 के प्रातः काल में वे अचेत हो गए और दोपहर होते होते उन्होने प्राण त्याग दिए। इस समय रामानुजन की आयु मात्र 33 वर्ष थी। इस महान गणितग्य का निधन गणित जगत के लिए अपूरणीय क्षति था।

Amazing Facts about Srinivasa Ramanujan in Hindi – श्रीनिवास रामानुजन् के बारे में रोचक तथ्य

रामानुजन्आज हम बात करेंगे एक ऐसे शख़्स की जो एक गरीब घर में पैदा हुआ था लेकिन मैथ की दुनिया में नाम कमा गया. जिस मैथ से आजकल के बच्चे डरते है ना उसमें तो वो जीनियस था जीनियस. इनका नाम था श्रीनिवास रामानुजन्. इनके बारे में डिटेल में जानते है So Let’s begin….

1. 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के ईरोड गांव में श्रीनिवास अय्यांगर और कोमलतामल के घर एक बच्चा पैदा हुआ था, नाम रखा गया रामानुजन्. आगे जाकर ये क्या करने वाला है किसी को कुछ पता नही था. रामानुजन् के पिता एक साड़ी की दुकान पर क्लर्क और माँ हाऊस वाइफ थी।

2. रामानुजन् के सभी भाई-बहन बचपन में मर गए. दरअसल, 1889 में चेचक नाम की बीमारी फैल गई थी. इस साल चेचक से तंजावुर जिले में हजारों लोग मारे गए थे. लेकिन रामानुजन् फिर से ठीक हो गए।

3. करीबी बताते है कि रामानुज़न् पैदा होने के 3 साल तक बोले नही थे. घरवालों ने सोचने लगे थे कहीं ये गूँगा तो नही है. 10 साल की उम्र में रामानुज प्राइमरी क्लास में जिले में पहले नंबर पर आए।

4. बचपन में रामानुजन् स्कूल जाने से बचते थे. इनके घरवालों ने ये देखने के लिए स्पेशल एक आदमी की ड्यूटी लगाई थी कि रामानुज़न् ने आज स्कूल भी लगाया है या नही।

5. घर का खर्च निकालने के लिए रामानुजन् बचपन में ट्यूशन पढ़ाया करते थे. इन्हें ट्यूशन के हर महीने 5 रूपए मिलते थे। रामानुजन् थे सातवीं कक्षा में और ट्यूशन पढ़ाते थे बी. ए. के लड़के को।

6. 13 साल की उम्र में खुद की थ्योरम बनाने वाले रामानुजन् ने मैथ की कभी कोई अलग से शिक्षा नही ली।

7. रामानुज़न् ने 11 साल की उम्र में, काॅलेज के स्तर का मैथ याद कर लिया था. 13 साल की उम्र में, एडवांस ट्रिग्नोमेट्री को रट दिया और खुद की थ्योरम बनाने लगे. 17 साल की उम्र में, बर्नोली नंबरों की जाँच की और 15 डेसिमल प्वाॅइंट तक यूलर(Euler) कांस्टेंट की वैल्यू खोज दी थी।

8. जब रामानुजन् 16 साल के थे, तो उनके दोस्त ने लाइब्रेरी से जी. एस. कार की लिखी हुई एक किताब दी “A Synopsis of Elementary Results in Pure and Applied Mathematics”. इसमें 5000 से ज्यादा थ्योरम थी. रामानुज़न् ने ये किताब सारी पढ़ डाली पूरे ध्यान से. बस यहीं से उनके मैथ जीनियस बनने का सफ़र शुरू हो गया।

9. रामानुजन् अपने मैथ के पेपर को आधे से भी कम समय में पूरा कर देते थे।

10. गणित में जीनियस होने के कारण रामानुज़न् को सरकारी आर्ट्स काॅलेज में पढ़ाई करने के लिए स्काॅलरशिप मिली थी. लेकिन इन्होनें मैथ में इतना ध्यान लगाया, इतना ध्यान लगाया कि बाकी सभी सब्जेक्ट में फेल हो गए. इससे इनकी स्काॅलरशिप भी छिन ली गई।

11. पेपर बहुत महंगे होने के कारण रामानुजन् मैथ के सवाल निकालने के लिए ‘स्लेट’ का यूज करते थे. हालांकि ये एक रजिस्टर भी रखते थे जिसमें स्लेट से फाॅर्मूला उतारते थे. रामानुजन् जब कही नौकरी की तलाश में जाते थे तो अक्सर यही रजिस्टर दिखाते थे लेकिन लोग इसे नजरअंदाज कर देते थे।

12. जब रामानुज़न् 22 साल के हो गए तो 10 साल की जानकी से इनका ब्याह कर दिया गया. ब्याह के बाद रामानुज़न् को ‘हाइड्रोसील टेस्टिस’ यानि अंडकोष में होने वाली एक बीमारी हो गई. घर पर इलाज के पैसे नही थे तो एक डाॅक्टर ने फ्री में सर्जरी कर दी. सर्जरी के बाद वो बीमार पड़ गए, सोचा अब नही बच पाऊँगा लेकिन ठीक हो गए।

13. 1913 में 26 साल की उम्र में रामानुजन् ने मैथ के 120 सूत्र लिखे और अंग्रेज प्रोफेसर जी. एच. हार्डी के पास भेज दिए. हार्डी ने पहले तो खास ध्यान नही दिया लेकिन पढ़ने के बाद उसे लगा कि ये तो कोई विद्वान है. फिर क्या था बुला लिया रामानुज को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी।

14. रामानुज़न् ने इंग्लैड जाने से मना कर दिया लेकिन हार्डी ने जैसे-तैसे करके मना ही लिया. रामानुज धर्म-कर्म के पक्के थे. इंग्लैड जैसे ठंडे देश में भी रोज नहाते थे, पक्के ब्राह्मण होने के कारण शाकाहरी भी थे. यहाँ ठीक खाना न मिलने से वो बीमार पड़ गए और वापिस मद्रास आ गए।

15. रामानुजन् के बारे में एक तथ्य और बता दूँ, जब वो इंग्लैंड में थे तो उन्होनें आत्महत्या करने की सोची थी लेकिन मौके पर पुलिसकर्मी ने पकड़ लिया, पुलिसवाला जेल में भेजने ही वाला था तो प्रोफेसर हार्डी ने इसमें हस्तक्षेप किया और पुलिसकर्मी से झूठ बोला कि रामानुजन् एफआरएस(Fellow of Rayal Society) का सदस्य है और तुम इस तरह एक एफआरएस को जेल में नही भेज सकते. कुछ महीने बाद रामानुज़न् सच में FRS का सदस्य बन गया।

16. 1918 में 31 साल की उम्र में श्रीनिवास रामानुजन् को राॅयल सोसाइटी का सबसे कम उम्र का साथी चुना गया. 1841 में Ardaseer Cursetjee के बाद ऐसा करने वाले वे दूसरे भारतीय बन गए. 13 अक्टूबर 1918 को रामानुज को ट्रिनिटी काॅलेज का साथी चुना गया. ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय थे।

17. भारतीय राज्य तमिलनाडु, रामानुजन् के जन्मदिन को IT Day के रूप में और पूरा देश National Mathematics Day के रूप में मनाता है।

18. रामानुजन् ने अपनी 32 साल की लाइफ में 3884 इक्वेशन बनाईं. इनमें से कई तो आज भी अनसुलझी है. मैथ में 1729 को रामानुजन संख्या के नाम से जाना जाता है।

19. इंग्लैंड से आने के बाद भी तेज़ बुखार, खांसी और पतला होने के कारण उनकी हालत गंभीर होती गई. 26 April, 1920 को 32 साल की उम्र में श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर की मौत हो गई। कुंबकोणम में इनके पैतृक निवास को अब म्यूजियम बना दिया गया है।

20. श्रीनिवास रामानुजन् को “Man Who Knew Infinty” कहा जाता है क्योकिं इनके प्रमुख योगदान में से 60% से ज्यादा Infinite series के सूत्र थे।

श्रीनिवास रामानुजन प्रेरक विचार Srinivasa Ramanujan Quotes in Hindi

वे धर्म और आध्यात्म में केवल विश्वास ही नहीं रखते थे बल्कि उसे तार्किक रूप से प्रस्तुत भी करते थे। वे कहते थे कि
“मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं है जिससे मुझे आध्यात्मिक विचार न मिलते हों।”
जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे ऊपर हैं , वैसे ही वेदांग और शाश्त्रों में गणित का स्थान सबसे ऊपर है ।
बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ हैं ? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है / उसको गणित के बिना समझा नहीं जा सकता ।
ज्यामिति की रेखाओं और चित्रों में हम वे अक्षर सीखतें हैं जिनसे यह संसार रूपी महँ पुस्तक लिखी गयी है ।
गणित एक ऐसा उपकरण है जिसकी शक्ति अतुल्य है और जिसका उपयोग सर्वत्र है ; एक ऐसी भाषा जिसको प्रकृति अवश्य सुनेगी और जिसका सदा वह उत्तर देगी ।
काफी हद तक गणित का सम्बन्ध केवल सूत्रों और समीकरणों से ही नहीं है । इसका सम्बन्ध सी. डी से , पार्किंग मीटरों से , राष्ट्रपति चुनावों से , और कंप्यूटर ग्राफिक्स से है ।गणित इस जगत को देखने और इसका वर्णन करने के लिए है ताकि हम उन समस्यायों काहल कर सकें हो अर्थपूर्ण हैं ।
गणित एक भाषा है ।
लोटरी को मैं गणित न जानने वालों के ऊपर एक कर की भांति देखता हूँ ।
यह असंभव है की गति के गणितीय सिधांत के बिना हम वृहस्पति पर रोकेट भेज पाते ।
जिस प्रकार मोरों में शिखा एवं नागों में मणि का स्थान सबसे ऊपर है, उसी प्रकार सभी वेदांग और शास्त्रों मेंगणित का स्थान सबसे ऊपर है।
बहुभिर्प्रलापैः किम् , त्रयलोके सचरारे ।यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम् , गणितेन् विना न हि ॥
बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है, वह गणित के बिना नहीं है / उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता।
ज्यामिति की रेखाओं और चित्रों में हम वे अक्षर सीखते हैं जिनसे यह संसार रूपी महान पुस्तक लिखी गयी है।
गणित के बिना, आप कुछ नहीं कर सकते हो। आप के चारों ओर सब कुछ गणित है। आप के चारों ओर सब कुछ संख्या है।
गणित कोई वर्ण या भौगोलिक सीमा नहीं जानता है; गणित के लिए, सांस्कृतिकदुनिया केवल एक देश है।
यदि मुझे फिर से अपनी पढ़ाई शुरू करनी पडी, तो मैं प्लेटो की सलाह मानूंगा औरअपनी पढाई गणित के साथ शुरू करूँगा।
मेरी गणित में दिलचस्पी केवल एक रचनात्मक कला के रूप में है।
हमें उम्मीद है, श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी के बारे में यह कहानी पढ़ने के बाद आप श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी की संक्षिप्त और महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र करेंगे। यदि कुछ हमने श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी के बारे में गलत या थोड़ा विवरण प्रकाशित किया है, तो कृपया अपना संदेश कमेंट बॉक्स में छोड़ दें या हमें मेल करें ताकि हम इस लेख को त्रुटिहीन करने का प्रयास करेंगे।

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