जिद्दू कृष्णमूर्ति जीवनी - Biography Of Jiddu Krishnamurti in Hindi

जिद्दू कृष्णमूर्ति को पूरे विश्व में अब तक के सबसे महान धार्मिक शिक्षकों में से एक माना जाता है, लेकिन उन्होंने स्वयं को कभी किसी धर्म, संप्रदाय या देश विशेष से जुड़ा हुआ नहीं माना। उन्होंने स्वयं को कभी किसी राजनीतिक सोच या विचारधारा से नहीं जोड़ा। इसके विपरीत उनका कहना था कि ये चीज़ें मनुष्य-मनुष्य के बीच अलगाव पैदा करती हैं और अन्ततः संघर्ष और युद्ध का कारण बनती हैं। उन्होंने इस बात पर हमेशा ज़ोर दिया कि मनुष्य की चेतना और मानवजाति की चेतना अलग नहीं है, बल्कि हमारे भीतर पूरी मानव जाति, पूरा विश्व प्रतिबिंबित होता है। प्रकृति और परिवेश से मनुष्य के गहरे रिश्ते और एकत्व की उन्होंने बात की। इस प्रकार उनकी शिक्षा मानव निर्मित सारी दीवारों, धार्मिक विश्वासों, राष्ट्रीय बँटवारों, और सांप्रदायिक दृष्टिकोणों से परे जाने का संदेश देती है।

जिद्दू कृष्णमूर्ति जीवनी - Biography Of Jiddu Krishnamurti in Hindi

नाम :– जिद्दू कृष्णमूर्ति।
जन्म :– 12 मई, 1895, तमिलनाडु।
पिता : ।
माता : ।
पत्नी/पति :– ।

प्रारम्भिक जीवन :

        जे. कृष्णमूर्ति का जन्म तमिलनाडु के एक छोटे-से नगर में निर्धन ब्राह्मण परिवार में 12 मई, 1895 को हुआ था। अपने माता-पिता की आठवीं संतान के रूप में उनका जन्म हुआ था इसीलिए उनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया। कृष्ण भी वासुदेव की आठवीं संतान थे। इनके पिता 'जिद्दू नारायनिया' ब्रिटिश प्रशासन में सरकारी कर्मचारी थे। जब कृष्णमूर्ति केवल दस साल के ही थे, तभी इनकी माता 'संजीवामा' का निधन हो गया। बचपन से ही इनमें कुछ असाधारणता थी।

        थियोसोफ़िकल सोसाइटी के सदस्य पहले ही किसी विश्वगुरु के आगमन की भविष्यवाणी कर चुके थे। श्रीमती एनी बेसेंट और थियोसोफ़िकल सोसाइटी के प्रमुखों को जे. कृष्णमूर्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखाई दिये, जो कि एक विश्वगुरु में होते हैं। एनी बेसेंट ने जे. कृष्णमूर्ति की किशोरावस्था में ही उन्हें गोद ले लिया और उनकी परवरिश पूर्णतया धर्म और आध्यात्म से ओत-प्रोत वातावरण में हुई।

विचार :

        कृष्णमूर्ति के विचारों के जन्म को उसी तरह माना जाता है जिस तरह की एटम बम का अविष्कार के होने को। कृष्णमूर्ति अनेकों बुद्धिजीवियों के लिए रहस्यमय व्यक्ति तो थे ही साथ ही उनके कारण विश्व में जो बौद्धिक विस्फोट हुआ है उसने अनेकों विचारकों, साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों को अपनी जद में ले लिया। उनके बाद विचारों का अंत होता है। उनके बाद सिर्फ विस्तार की ही बातें हैं। 1927 में एनी बेसेंट ने उन्हें 'विश्व गुरु' घोषित किया। किन्तु दो वर्ष बाद ही कृष्णमूर्ति ने थियोसोफ़िकल विचारधारा से नाता तोड़कर अपने नये दृष्टिकोण का प्रतिपादन आरम्भ कर दिया।

        अब उन्होंने अपने स्वतंत्र विचार देने शुरू कर दिये। उनका कहना था कि व्यक्तित्व के पूर्ण रूपान्तरण से ही विश्व से संघर्ष और पीड़ा को मिटाया जा सकता है। हम अन्दर से अतीत का बोझ और भविष्य का भय हटा दें और अपने मस्तिष्क को मुक्त रखें। उन्होंने 'आर्डर ऑफ़ द स्टार' को भंग करते हुए कहा कि 'अब से कृपा करके याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो सच को दबाते हैं। सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है।...सच को ढूँढने के लिए मनुष्य को सभी बंधनों से स्वतंत्र होना आवश्यक है।'

        उन्होंने सत्य के मित्र और प्रेमी की भूमिका निभायी लेकिन स्वयं को कभी भी गुरू के रूप में नहीं रखा। उन्होंने जो भी कहा वह उनकी अन्तर्दृष्टि का संप्रेषण था। उन्होनंे दर्शनशास्त्र की किसी नई पद्धति या प्रणाली की व्याख्या नहीं की, बल्कि मनुष्य की रोज़मर्रा की जिन्दगी से ही - भ्रष्ट और हिंसापूर्ण समाज की चुनौतियों, मनुष्य की सुरक्षा और सुख की खोज, भय, दुख, क्रोध जैसे विषयों पर कहा। बारीकी से मानव मन की गुत्थियों को सुलझा कर लोगों के सामने रखा।

         दैनिक जीवन में ध्यान के यथार्थ स्वरूप, धार्मिकता की महत्ता के बारे में बताया। उन्होनंे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में उस आमूलचूल परिवर्तन की बात कही जिससे मानवता की वास्तविक प्रगति की ओर उन्मुख हुआ जा सके।

        अपने कार्य के बारे में उन्होंने कहा ”यहां किसी विश्वास की कोई मांग या अपेक्षा नहीं है, यहां अनुयायी नहीं है, पंथ संप्रदाय नहीं है, व किसी भी दिशा में उन्मुख करने के लिए किसी तरह का फुसलाना प्रेरित करना नहीं है, और इसलिए हम एक ही तल पर, एक ही आधार पर और एक ही स्तर पर मिल पाते हैं, क्योंकि तभी हम सब एक साथ मिलकर मानव जीवन के अद्भुत घटनाक्रम का अवलोकन कर सकते हैं।”

        १९८६ में ९० वर्ष की आयु में कृष्णमूर्ति की मृत्यु हुई, मेरी लट्यंस द्वारालिखित उनकी वृहदाकार जीवनी के दो खंड 'थे यिअर्ज़ अॉफ अवेकनिंग, (१९७५) तथा 'द यीअर्ज अॉफ फुलफिलमेंट' (१९८३) प्रकाशित हो चुके थे। तीसरा खंड 'द ओपन डोर' १९८८ में प्रकाशित हुआ। इन तीनों खण्डों को मेरी लटयंस ने 'द लाइफ एंड डेथ अॉफ जे.कृष्णमूर्ति' नाम से एक पुस्तक में समेटा है।

जानिए जे. कृष्णमूर्ति के 10 विचार, कुछ भी नहीं होना ही कुछ होना है 

        कृष्णमूर्ति की शिक्षाओ को समझने के लिए उनके जीवन की, उनके मृत्यु की विशदता को जानना-समझना महत्वपूर्ण है। “शिक्षा का सबसे बड़ा कार्य एक ऐसे समग्र व्यक्ति का विकास है जो जीवन की समग्रता को पहचान सके। आदर्शवादी और विशेषज्ञ दोनों ही समग्र से नहीं खण्ड से जुड़े हुए होते हैं। जब तक हम किसी एक ही प्रकार की कार्यप्रणाली का आग्रह नहीं छोड़ते तब तक समग्रता का बोध सम्भव नहीं है।”

1. मानव बनने की शर्त : 

कृष्णमूर्ति का कहना था कि आपने जो कुछ भी परम्परा, देश और काल से जाना है उससे मुक्त होकर ही आप सच्चे अर्थों में मानव बन पाएंगे। (मनुष्य के सर्व प्रथम मनुष्य होने से ही मुक्ति की शुरुआत होती है। किंतु आज का मानव हिंदू, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान, अमेरिकी, अरबी या चाइनी है।)

2. स्वतंत्र सोच होना चाहिए : 

जीवन का परिवर्तन सिर्फ इसी बोध में निहित है कि आप स्वतंत्र रूप से सोचते हैं कि नहीं और आप अपनी सोच पर ध्यान देते हैं कि नहीं। (मतबल यह कि आप एक मजहबी कुएं में बैठकर ही सोचते रहते हैं या कि आपकी खुद की सोच भी है या नहीं? यह भी की आप जो सोच रहे हैं उस पर सोचते हैं कि नहीं कि मैं क्या सोच रहा हूं सही या गलत? धर्म, राष्ट्र, समाज या अन्य किसी का चश्मा पहनकर दुनिया को ना देखें।)

3. सच एक अनजान पथ : 

एनी बेसेंट चाहती थीं कि कृष्णमूर्ति में वे संभावनाएं है जिससे बुद्ध की चेतना उन में उतर कर कार्य करें, लेकिन 'आर्डर ऑफ दि स्टार' के हॉलेंड स्थित एक कैम्प में जहां दुनिया भर के लोग एकत्रित हुए थे वहां भरी सभा में कृष्णमूर्ति ने यह कहकर सभी को चौंका दिया कि 'सच तो एक अंजान पथ है। कोई भी संस्था, कोई भी मत सच तक रहनुमाई नहीं कर सकता।'

4. सच तुम्हारे भीतर है : 

उन्होंने 'आर्डर ऑफ दि स्टार' को भंग करते हुए कहा कि 'अब से कृपा करके याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो सच को दबाते हैं। सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है।..सच को ढूँढने के लिए मनुष्य को सभी बंधनों से स्वतंत्र होना आवश्यक है।'

5. राजनीतिज्ञों के पास हल नहीं है : 

संसार विनाश की राह पर आ चुका है और इसका हल तथाकथित धार्मिकों और राजनीतिज्ञों के पास नहीं है। (जे. कृष्ण मूर्ति का मानना था कि राजनीतिक सोच के लोगों के पास संसार की समस्याओं का कोई हल हो भी तो वे उसे हल नहीं करना चाहेंगे क्योंकि वे सभी अपने राजनीतिक हितों के बारे में सोचते हैं।)

6. कुछ भी नहीं होना ही कुछ होना है : दुनिया को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है यथार्थवादी और स्पष्ट मार्ग पर चलना। आपके भीतर कुछ भी नहीं होना चाहिए तब आप एक साफ और सुस्पष्ट आकाश होने के लिए तैयार हो। धरती का हिस्सा नहीं, आप स्वयं आकाश हैं। जे. कृष्णमूर्ति का कहना है कि यदि आप कुछ भी है तो फिर आप कुछ नहीं।

7. प्रवचन एक तरफा विचार है : 

जे. कृष्णमूर्ति कहते थे कि ज्ञान के लिए संवादपूर्ण बातचीत करो, बहस नहीं, प्रवचन नहीं। बातचीत सवालों के समाधान को खोजती है, बहस नए सवाल खड़े करती जाती है और प्रवचन एकतरफा विचार है।

8. ज्ञान नहीं अंतर्दृष्टी होना चाहिए : 

किसी भी चीज की गहरे तक समझ और चीज की त्वरित समझ। यहां तक कि समझने के लिए ध्यान पूर्वक सुनना। कई मर्तबा आप सिर्फ देखते हैं, मगर सुनते नहीं। कुछ सीखने के बाद आप वैसा करने लगते हैं, इसका मतलब हुआ जब सीखने की क्रिया में जानकारी और ज्ञान का संग्रहण होता है, तो आप ज्ञान के मुताबिक काम करने लगते हैं, चाहे वह काम कुशलता से करें या अकुशलता से। अर्थात सीखना यानी ज्ञान प्राप्त करना और उसका उपयोग करना है। फिर करो और सीखो भी एक तरीका है, जो सीखने और करने से बहुत अलग नहीं है। दोनों में ही ज्ञान का आधार विद्यमान है। इस तरह ज्ञान आपका स्वामी हो गया या ज्ञान आपका शासक हो गया। जहां भी सत्ता या शासक हो जाता है, वहां दमन भी होता है। इस प्रक्रिया से आप कहीं नहीं पहुंचते, यह तो एक यांत्रिक क्रिया है। उक्त दोनों प्रक्रिया में आप यांत्रिक गति ही देखते हैं। अगर आप सचमुच उस यांत्रिक गति को पहचान लेते हैं, तो इसका मतलब उस गति में आपकी जो दृष्टि है, वही है अंतर्दृष्टी। इसका मतलब हुआ कि आप ज्ञान से कोई बात नहीं सीखते, बल्कि सीखते हैं ज्ञान और उसकी सत्ता में निहित तत्वों को देखकर और इसलिए आपके सीखने का पूरा व्यवहार ही अलग प्रकार का हो जाता है।

9. ईश्‍वर को मनुष्‍य ने बनाया :

ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया, बल्कि ईश्वर का जन्मदाता तो खुद मनुष्य है। मनुष्य ने ईश्वर का आविष्कार अपने फायदे के लिए किया है। (कृष्णमूर्ति को ईश्‍वर एक विचार से ज्यादा कुछ नजर नहीं आता। यानी, मनुष्य की जैसी अवधारणा है, उसका ईश्‍वर वैसा ही है। इसीलिए हर धर्म का ईश्वर अलग है। उनके अनुसार अगर ईश्वर है भी तो उसके होने से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। अब तक किस समस्या का समाधान ईश्वर से हुआ?)

10. मानसिक विकार : 

प्रणय या सहवास करना कोई समस्या नहीं है, लेकिन उसके बारे में हरदम सोचते रहना एक समस्या है जिससे ज्यादातर लोग पीड़ित हैं। यह क्रिया कुछ पलों के लिए ही सही लेकिन इंसान के अहम को पूरी तरह गायब कर देती है, इस तरह वह इन पलों में खुद को और अपनी तमाम समस्याओं को भुला देता है और फिर बार-बार यह स्थिति पाने की कोशिश करता है। यहीं से यह क्रिया एक समस्या बन जाती है।

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