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दशरथ मांझी 'माउंटेन मैन' जीवनी - Biography of Dashrath Manjhi Mountain Man in Hindi

अकेला शख़्स पहाड़ भी फोड़ सकता है! दशरथ मांझी के जीवन में हुए संघर्ष से परिचय

दशरथ माँझी (माउंटेन मैन)


दशरथ माँझी
जन्म
दशरथ
14 
जनवरी 1929
गहलौरबिहारभारत

मृत्यु
17 अगस्त 2007
नयी दिल्लीभारत

मृत्यु का कारण
पित्ताशय कैंसर

राष्ट्रीयता
भारतीय

अन्य नाम
माउंटेन मैन

व्यवसाय
मज़दूरी

प्रसिद्धि कारण
वह अकेले पहाड़ को काटकर सड़क का निर्माण किया। पर्वत पुरूष दशरथ माँझी को 22 वर्षों तक नि:शुल्क छेनी-हथौड़ा पहाड़ तोड़ने के लिए हैमर मैन शिवू मिस्त्री ने प्रदान किये। उन्हीं के दिए छेनी-हथौड़े से दशरथ माँझी ने पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। दशरथ के कार्य में जान फूँकी थीश्री मिस्त्री का अहम योगदान।

जीवनसाथी
फाल्गुनी देवी


कौन है दशरथ माँझी (माउंटेन मैन) एक परिचय

कहां जाता है मनुष्य जब जोर लगाता है पत्थर पानी बन जाता है। ऐसा कोई कार्य नहीं से मनुष्य चाह ले और वह कार्य पूर्ण ना हो। मनुष्य के अंदर उपस्थित क्षमता को पहचान पाना मनुष्य के लिए ही कठिन साबित हो सकता है। लेकिन जिस दिन मनुष्य ने अपने अंदर उपस्थित अपनी शक्ति अपनी क्षमता अपने कौशल को पहचान लेगा। उस दिन के बाद मनुष्य किसी भी कार्य को सफलता पूर्ण करने में सक्षम हो जाएगा। आप सभी जानते हैं कि दुनिया में ऐसा कोई कार्य नहीं है जो मनुष्य नहीं कर सकता है। (प्रेरणादायक कहानी दशरथ मांझी मनुष्य जब जोड़ लगता है पत्थर पानी बन जाता है)
दशरथ मांझी का जन्म 1934 ईस्वी में बिहार राज्य के गया जिले के पास हुआ था। इनके जन्म की कोई निश्चित समय और निश्चित महीना नहीं बताया जा रहा है। दशरथ मांझी का जन्म जब हुआ उस समय भारत अंग्रेजों के गुलाम था। चारों तरफ अंग्रेजी शासन होने के कारण दशरथ मांझी के गांव की हालत कुछ ज्यादा ही खराब थी। यहाँ के लोगो को पुरा पेट खाना तक नसीब नहीं होता था 1947 में जब भारत आजाद हुआ। भारत के आजाद होने के बाद शासन जमींदारों के हाथ चली गई। जमींदार लोग गांव के लोगों को बहुत ज्यादा परेशान किया करते थे। उन्हें तरह तरह की यातनाएं दी जाती थी।
          एक बार दशरथ मांझी के पिता ने किसी जमींदार से कुछ पैसे उधार लिए। पैसे समय पर ना चुकाने के कारण जमींदार ने दशरथ मांझी के पिता को दशरथ मांझी को बंधुआ मजदूर बनाने के लिए कहा। जैसा की आप सभी जानते है पहले  बदुआ मजद्दोर बना के उससे जानवरो की तरह काम करवाया जाता था  लेकिन दशरथ मांझी को किसी के गुलाम बनने की बात कतई कबूल ना थी। यही कारण था कि दशरथ मांझी बड़ी अल्प आयु में ही अपने घर को छोड़कर घर से भाग गए। दशरथ मांझी घर छोड़ के झारखंड चले गए। वहां वह कोयले की खान में काम करने लगे।
लेकिन कुछ दिनों के बाद अपने पिता और अपने घरवालों की याद सताने के कारण दशरथ मांझी फिर से वापस अपने गांव आ गए। गांव आने के बाद दशरथ मांझी को पता चला कि उनकी माता का स्वर्गवास हो चुका है। दशरथ मांझी अब अपने पिता के साथ अपना जीवन व्यतीत करने लगे। इतने समय के बाद आने के बाद भी दशरथ मांझी ने अपने गांव की हालत वैसे ही देखा जैसा वह यहां से छोड़ कर गए थे। आज भी उनके गांव में जमींदारों का ही राज था सड़क नहीं थी बिजली नहीं थी पढ़ाई का कोई सुविधा नहीं था।


दशरथ माँझी (माउंटेन मैन) बनने की कहानी 

इन सब चीजों को देखते हुए भी दशरथ मांझी अपने पिता के साथ अपने गांव में ही जीवन व्यतीत करने लगे। कुछ समय में दशरथ मांझी को गांव की एक लड़की से प्यार हो गया। इसी लड़की से दशरथ माझी को बचपन में बाल विवाह भी करवाया गया था। लड़की का नाम फाल्गुनी देवी था। जब दशरथ मांझी के पिता फाल्गुनी के पिता से उनकी बेटी का हाथ मांगने गए तो लड़की के पिता ने साफ मना कर दिया। उन्होंने दशरथ मांझी के बारे में बताया कि यह किसी काम का नहीं यह कोई काम नहीं कर सकता पर बैठकर खाता रहता है कोई काम नहीं करता इसी कारण से वह अपनी बेटी की शादी दशरथ मांझी से बिल्कुल नहीं करेंगे।
यह सुनकर दशरथ मांझी बहुत दुखी हो गए। लेकिन फाल्गुनी को भी दशरथ मांझी से अति लगाव हो गया था। यही लगाव के कारण दशरथ मांझी और फाल्गुनी दोनों घर छोड़कर भाग गए। लेकिन भगवान को यह मंजूर नहीं था। कर जहां दशरथ माझी और उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी आकर रहने लगी वह पहाड़ी इलाका था। लोगों को कहीं आने जाने के लिए बाहर ऊपर चढ़कर जाना पड़ता था। आस-पास में कोई अच्छे रास्ते का साधन ना होने के कारण गांव वाले सभी मजबूरी बस किसी पहाड़ से अपने आने जाने का रास्ता बनाया। लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब दशरथ राम मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी इसी पहाड़ से कहीं जा रही थी।



और वह पहाड़ों के बीच गिर के मर गई। फाल्गुनी देवी के मरने की खबर सुन के दशरथ मांझी के पैरों तले जमीन खिसक गया। क्योकि दशरथ मांझी अपने पति फाल्गुनी से बहुत ज्यादा प्यार करते थे। फाल्गुनी देवी की मृत्यु की खबर सुनकर दशरथ मांझी पागल से हो गए। उसी संकल्प लिया कि इस पहाड़ को वह हमेशा के लिए समाप्त कर देंगे। सुनने में जितना आसान लगता है कि किसी भी बड़े पहाड़ को तोड़कर समाप्त कर देना करने के समय उतना ही नामुमकिन प्रतीत होता है। लेकिन दशरथ मांझी के शक्ति और कठिन परिश्रम लगन को देखकर आप सभी दंग रह जाएंगे। 260 फुट लंबा 25 फुट गहरा 30 फुट चौड़ा पहाड़ को तोड़कर गलहोर की पहाड़ियों में रास्ता बनाना शुरु कर दिया। दशरथ मांझी ने जब पहाड़ों को तोड़ना शुरू किया तो इन्हें आसपास के गांव के लोग पागल बोलते थे।
आने जाने वाले सभी लोग इन्हें पागल के नाम से नवाजा हर कोई कहता था कि दशरथ मांझी पत्नी के मरने के सोक में पागल सा हो गया है। लेकिन मन में लिया हुआ दृढ़ संकल्प दशरथ मांझी को अपने पथ से डिगा नहीं सका। रात-दिन दशरथ राम माझी बिना किसी भी तरह के रूकावट के   बिना बरसात बिना ठंड बिना गर्मी की सोच के इस पहाड़ को लगातार तोड़ते रहे। 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद दशरथ मांझी ने पहाड़ को तोड़ कर रास्ता बनाने में सफल रहे। 22 साल की कड़ी मेहनत 1 दिन दशरथ मांझी के जीवन में वह खुशी लाई जिसका इंतजार दशरथ मांझी 22 साल से करते आ रहे थे।  उन्होंने अपने काम को 22 वर्षों (1960-1982) में पूरा किया। इस सड़क ने गया के अत्रि और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी को 55 किमी से 15 किमी कर दिया। माँझी के प्रयास का मज़ाक उड़ाया गया पर उनके इस प्रयास ने गेहलौर के लोगों के जीवन को सरल बना दिया। हालांकि उन्होंने एक सुरक्षित पहाड़ को काटा, जो भारतीय वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम अनुसार दंडनीय है फिर भी उनका ये प्रयास सराहनीय है। बाद में मांझी ने कहा,” पहले-पहले गाँव वालों ने मुझपर ताने कसे लेकिन उनमें से कुछ ने मुझे खाना दीया और औज़ार खरीदने में मेरी सहायता भी की।

इसी कारण से दशरथ मांझी को आज पूरी दुनिया माउंटेन मैन के नाम से जानने लगी। इसलिए कहा जाता है मनुष्य जब जोर लगाता है पत्थर पानी बन जाता है। इंसान के अंदर वह शक्ति होनी चाहिए वह सोच होनी चाहिए वह दृढ़ संकल्प होना चाहिए। जो इंसान को उसकी सफलता के मार्ग पर अवश्य एक दिन अवश्य सफलता दिलाती है। कहां जाता है इंसान अपनी शक्ति का जिस दिन आभास कर ले। जिस दिन इंसान को अपनी शक्ति का ज्ञान हो जाएगा। वह दुनिया का असंभव से असंभव काम करने में भी संभव हो जाएगा। दशरथ मांझी भी एक साधारण इंसान थे।
कोशिश करने वालो की कभी हर नहीं 
जिन्होंने अपने जीवन में एक ऐसे संकल्प का निर्माण किया। जिसने 22 साल लगा दिए दशरथ मांझी को सफलता के मुकाम तक पहुंचाने में।  22 साल को छोटी समय नहीं होती। अच्छे अच्छे इंसानों का धैर्य टूट जाता है। लेकिन जिस इंसान का संकल्प दृढ हो उसे कोई अपने पथ से डिगा नहीं सकता। और एक दिन ऐसा आया कि दशरथ राम मांझी ने इतने बड़े पहाड़ को चकनाचूर कर के इसके सीने को फाड़ के बीच सड़क का निर्माण कर दिया। एक समय दशरथ मांझी को इंदिरा गांधी से मिलने जाना था। जब वह ट्रेन पर चलें लेकिन टिकट न होने के कारन TT ने दशरथ मांझी को  ट्रेन से धक्के मार कर बाहर कर दिया।
लेकिन दशरथ मांझी ने हार नहीं मानी उन्होंने पैदल रेल की पटरी के सहारे दिल्ली तक का सफर किया। ऐसे दृढ़ संकल्प इंसान को मामूली समझना मूर्खतापूर्ण कार्य होगा। किसी भी इंसान के अंदर कितनी बड़ी शक्ति इतना ऊर्जा इतनी बुद्धिमानी इतनी ताकत उसको अपने अंदर किए हुए दृढ़ संकल्प से ही मिल सकता है। हमारे जीवन में किसी भी उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमें अपने जीवन में एक दृढ़ संकल्प करना अतिआवश्यक है। बिना संकल्प के हम अपने जीवन में किसी भी कार्य को पूर्ण नहीं कर सकते हैं। अतः आप सभी से भी निवेदन करता हूं अगर आप अपने जीवन में किसी काम को किसी लक्ष्य को इसी उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते है 
उसका एक दृढ़ संकल्प आपके मन में अवश्य होना चाहिए। दुनिया के तमाम लोगों को अलग-अलग तरह की कार्य को संपन्न करने की इच्छा होती है। विद्यार्थी है तो उसे अपने पढ़ाई के प्रति लगनशील होना चाहिए। कोई किसान है उसे अपनी खेती के तरफ कार्य में लगनशील होना चाहिए। कोई व्यापारी है तो उसे अपने व्यापार में अपने व्यापार के कार्य में लगनशील होना चाहिए। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आप अपने जिस काम में खुद को सफल करना चाहते हैं उस काम के प्रति आपके मन में एक दृढ़ संकल्प दृढ़ निश्चय अवश्य होना चाहिए।
हमारे द्वारा लिए गए दृढ़ संकल्प एक दिन हमें सफलता के मार्ग पर अवश्य पहुंचाती है। दशरथ राम मांझी के जीवन में भी अपने पत्नी से लगाव होने के कारण वो इतने व्याकुल हो गए कि उन्हें एक ऐसा दृढ़ संकल्प लिया कि इतने बड़े लंबे चौड़े पहाड़ का सीना चीर के बीच से रास्ता निकाल दिया।
एक अकेला इंसान के लिए कर पाना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन हमरी सोच अगर दृढ़ है। तो एक  दिन हमारे दृढ़ संकल्प को पूरा करने में आवश्यक हमारी मदद करता है। एक दिन ऐसा आता है कि अपने दृढ़ संकल्प अवश्य पूरा कर लेते हैं। पहाड़ो से लड़ने वाली दशरथ मांझी कुछ दिनों तो अपने कैंसर की बीमारी से लड़ते रहे। एक समय ऐसा भी आया कैंसर की बीमारी उन पर ज्यादा हावी हो गई। सन 2007 में श्री दशरथ मांझी का देहांत हो गया। इनके देहांत के उपरांत बिहार राज्य द्वारा राजकीय सम्मान के साथ श्रद्धांजलि दी गई। आज भले ही श्री दशरथ मांझी हमारे बीच में ना रहे लेकिन इनके द्वारा किया गया कार्य सदा हमारे जीवन को एक उद्देश्य का राह दिखाता रहेगा। इनके द्वारा यह किया हुआ कार्य हमेशा हमारे जीवन को प्रेरित करता रहेगा।
बिना स्वार्थ के समाज के लिए किया गया काम एक ना एक दिन अवश्य उस व्यक्ति के जीवन में सफलता लाती है। जिस पहाड़ की वजह से गांव के लोगों को ५० किलों मीटर की दूरी तय करनी होती थी। दशरथ मांझी ने उसी पहाड़ को तोड़ तोड़ कर इस दूरी को 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर का कर दिया। शुरुआती दौर में तो दशरथ मांझी को गांव वालों ने बहुत ताने कसे। उसी गांव में से कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने जीतन राम मांझी को खाना और पहाड़ तोड़ने के लिए औजार का मुहैया करवाया। (प्रेरणादायक कहानी दशरथ मांझी मनुष्य जब जोड़ लगता है पत्थर पानी बन जाता है)

दशरथ मांझी 'माउंटेन मैन' जीवन एक प्रेरणा 

इनके जीवन से प्रेरित होकर दशरथ मांझी के ऊपर एक फिल्म भी दर्शाया गया है। जिस फिल्म का नाम द माउंटेन मैन दशरथ मांझी रखा गया है।17 अगस्त 2007 में दशरथ मांझी का निधन हो गया। लेकिन इनके द्वारा किया गया इंसान के संपूर्ण जीवन में हमेशा याद रहेगा। अपनी मृत्युशय्या पर, मांझी अपने जीवन पर एक फिल्म बनाने के लिए "विशेष अधिकार" दे दिया। 21 अगस्त 2015 को फिल्म को रिलीज़ किया गया।नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने माँझी की और राधिका आप्टे ने फाल्गुनी देवी की भूमिका निभाई है।मांझी के कामों को एक कन्नड़ फिल्म "ओलवे मंदार" (en:Olave Mandara) में जयतीर्थ (Jayatheertha) द्वारा दिखाया गया है।
मार्च 2014 में प्रसारित टीवी शो सत्यमेव जयते का सीजन 2 जिसकी मेजबानी आमिर खान में की, का पहला एपिसोड दशरथ माँझी को समर्पित किया गया।आमिर खान और राजेश रंजन भी माँझी के बेटे भागीरथ मांझी और बहू बसंती देवी से मुलाकात की मांझी की और वित्तीय सहायता प्रदान करने का वादा किया। हालांकि, 1 अप्रैल 2014 को चिकित्सीय देखभाल वहन करने में असमर्थ होने के कारण बसंती देवी की मृत्यु हो गयी। हाल ही में उसके पति ने ये कहा की अगर आमिर खान ने मदद का वादा पूरा किया होता तो ऐसा नहीं होता।

निधन : दुनिया से चले गए लेकिन यादों से नहीं!

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में पित्ताशय(गॉल ब्लैडर) के कैंसर से पीड़ित माँझी का 73 साल की उम्र में, 17 अगस्त 2007 को निधन हो गया। बिहार की राज्य सरकार के द्वारा इनका अंतिम संस्कार किया गया। बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गहलौर में उनके नाम पर 3 किमी लंबी एक सड़क और हॉस्पिटल बनवाने का फैसला किया।केतन मेहता ने उन्हें गरीबों का शाहजहां करार दिया. साल 2007 में जब 73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी.
अगर आप सभी को यह जानकारी पसंद आई हो। तो आप इसे दोस्तों के बीच शेयर अवश्य करें। ताकि दशरथ मांझी के जीवन की कठिन मेहनत का ज्ञान हमारे सभी भारतीयों को पता चले। अगर आपको किसी भी तरह का कोई सुझाव है तो आप हमें कमेंट के जरिए बता सकते हैं। आप किसी भी तरह का मैसेज हमें करना चाहते हैं तो आप हमें Facebook के जरिए मैसेज भी कर सकते हैं। मैसेज करने के लिए आपको हमारी वेबसाइट के होम पेज पर Facebook के जरिए मैसेज करने का विकल्प मिल जाएगा। हम आपके द्वारा किए गए प्रश्नों का अतिशीघ्र जवाब देने का प्रयास करेंगे। 

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